लखनऊ। उत्तराखंड संस्कृति या रहन सहन से तो आप सभी वाकिफ हैं। लेकिन नवाबों के शहर लखनऊ में उत्तराखंड की संस्कृति को बचाने का काम कर रही है गीता बिष्ट, उमर के जिस पड़ाव पर आ कर लोग खुद को थका हुआ मान कर बैठ जाते हैं। उमर के उस मोड़ पर गीता बिष्ट ने एक नई शुरुआत की है। बिष्ट को बचपन से ही पेंटिंग और हस्तकला में गहरी रुचि रही है। पढ़ाई, गृहस्थ जीवन, बच्चों की परवरिश और फिर नौकरी के कारण इस शौक को ज्यादा समय नहीं दे पाई, लेकिन जब भी समय मिलता तो ऐपण ( गेरू और चावल को पीस के बनाने वाली पेंटिंग) कला की पेंटिंग बनाती थी जो कि मेरे सहयोगियों और मित्रो को बहुत पसंद आती थी उन सब ने ही मनोबल बढ़ाया और सलाह दी कि हस्त निर्मित कला आसानी से उपलब्ध नहीं होती और इस कला को आगे बढ़ाने की सलाह दी और सहयोग भी दिया।
इन्होंने गिरी विकास अध्ययन संस्थान, लखनऊ से सेवानिवृत्ति के बाद जब स्वयं के लिए समय मिला है, तो अपनी इसी रचनात्मक यात्रा को नया रूप देने के लिए उत्तराखंड की पारंपरिक ऐपण कला को इंस्टाग्राम हैंडल पर geeta.kari के माध्यम से वॉल हैंगिंग, कोस्टर, जूट बैग, कैनवास बैग, कुशन कवर, की रिंग, पाउच, बुकमार्क, पूजा चौकी आदि वस्तुएं को हस्तकला द्वारा नई पीढ़ी से जोड़ने का छोटा से प्रयास शुरू किया है।
गीता बिष्ट का कहना है की इस सफर में मुझे मेरे पति और दोनों बेटों, बहु जानकी, प्रतिभा और साथ साथ बेटी शिवानी और कविता का भी मुझे भरपूर सहयोग मिलता रहा है, जिसके लिए मैं सदा आभारी रहूंगी। और मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरी कला और पेंटिंग में जो रुचि है। हस्तकला को बढ़ावा देना चाहिए यह न केवल सांस्कृतिक महत्व रखता है बल्कि आर्थिक व सामाजिक रूप से भी महत्व रखता है यह स्थानीय कारीगरों को रोजगार के अवसर प्रदान करता है और उनकी कला को जीवित रखता है।अद्वितीय,वस्तुएं प्रदान करता है।

